तुम लहर हो ||


कर्म, मन, वचन || इन तीन चीज़ों को पास रखो || अच्छे कर्म तब जाग्रत होते हैं जब मन स्वच्छ रहता है और वचन सॉफ रहते हैं || अंधकार को मिटाने की चाह दिल की सीमा पर से कभी नही मिटनी चाहिए; जिस प्रकार सागर की लहर बालू को छूती रहती है, उस ही प्रकार अच्छे मान से, करमो से, एवं वचन से, हर सुबह को रोशनी दिखाओ || और क्या है? तभी तो तुम भी लहर हो; स्वयं को भूलो मत, इन कठिन पीढ़ों में ही रक्त अपने मान की शांति को दान करने में मज़ा है || इस बुरे वक्त का भी अंत आएगा; अंधकार में रोशनी छिपी है, घौर से देखो, घौर से गहराई महसूस करो ||

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Posted on November 4, 2013, in Existence. Bookmark the permalink. Leave a comment.

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